रविवार, 2 मई 2010

जादुई ज़मीन का अंधेरा

एक कहानी सुनाता हूं... इसकी सौ फ़ीसदी गारंटी है कि सुनकर मज़ा आएगा। एक गांव में कुआं खुदवाया गया... पूरे 5 लाख रुपये के सरकारी खर्च पर... बीस फूटिया कुआं( इस इलाके में 20 फूट चौड़े मूंह वाले कुएं को इसी नाम से जानते हैं)... । मकसद था.. इलाके के खेतों की सिंचाई.. क्योंकि यहां न तो नदी है, न नहर। कुछ दिनों बाद कुआं खुदवाने वाले अधिकारी का जनहित में कहीं और तबादला हो गया। क्योंकि सरकार मानती है कि एक अधिकारी के एक ही जगह लंबे समय तक बने रहने से वहां उसका स्वार्थ पैदा हो जाता है और कामकाज़ में भेदभाव होने लगता है। उनकी जगह आए नये अधिकारी ने इलाके के विकास कार्यों का जायज़ा लिया। नये अधिकारी महोदय ने पाया की जिस कुएं के नाम पर कुछ ही दिन पहले 5 लाख रुपये खर्च किये गए, वो असल में कहीं है ही नहीं। फिर उन्होंने पुराने अधिकारी से संपर्क किया। उसके बाद क्या हुआ ज़रा गौर करें.... फिर से एक फाइल बनी जिसमें दलील दी गई की कुआं सड़क के किनारे ऐसी जगह बना दी गई है जिससे मवेशी अक्सर इसमें डूब जाते हैं और, जिस मकसद से कुआं खुदवाया गया था वो भी पूरा नहीं हो पा रहा है क्योंकि यह खेतों से काफी दूर है। इसलिए इस कुएं को भर दिया जाय।....... फिर 20 हज़ार रुपये के सरकारी खर्च पर कुएं में मिट्टी डालकर इसे बंद कर दिया गया।
ये है सूचना के अधिकार की हकीकत.....। आखिर लोग सूचना के अधिकार के अधीन कौन-सी सूचना मांगेंगे... जबकि सिस्टम में पारदर्शिता ही नहीं है। सरकार क्या करा रही है.... किन योजनाओं पर पैसे खर्च हो रहे हैं, एक आम इंसान को कौन बताए? वैसे मैं भी एक आम इंसान ही हूं... ये महज़ संयोग है कि मुझे इस अनोखी घटना की जानकारी मिल गई क्योंकि इनमें से एक अधिकारी मेरे किसी रिश्तेदार के किरायेदार थे...... वरना ऐसे कितने सरकारी कुएं अब तक बिना खुदाई के ढके गये होंगे किसी को नहीं मालूम। (मेरे आम इंसान होने का एक और प्रमाण ये है कि इस घपले की जानकारी मिलने के बाद भी मैं चुप रहा, क्योंकि मैं किसी पचड़े में नहीं पड़ना चाहता था।)
उम्मीद है कहानी सुनकर आपको मज़ा आया होगा और यही इस राज्य का दुर्भाग्य भी है कि लोग इसकी कहानियों में मज़े लेने लगे हैं।। बारह महीने 13 त्योहार ........ 10 साल आठ सरकार। बड़े अरमानों और लंबी लड़ाई के बाद ये राज्य बना था... खनिज संपदा से भरपूर। कल्पना की गई कि ये देश का सबसे विकसित राज्य होगा। लेकिन हुआ ठीक विपरीत। नये राज्य के नाम पर भूगोल के मानचित्र पर एक रेखा खींची गई.... एक राजधानी बना दी गई... कुछ नये अधिकारियों की नियुक्ति हो गई। तमाम संसाधनों से भरपूर होने के बाद भी ये राज्य कभी एक अच्छा प्रोडक्ट नहीं दे पाया..... हालांकि यहां सेल सालोंभर लगा रहता है..... लूटो....लूटो ......लूटो....।

सुनने में आया है कि यहां कि सरकार एक बार फिर से खतरे में है। आरोप हमेशा यहां की छोटी पार्टियों और निर्दलियों पर लगा है कि वो राज्य का हित नहीं केवल अपना हित चाहते हैं... इसलिए कुछ जेल तो कुछ बेल पर रहते हैं। लेकिन इस बार एक छोटी पार्टी के बड़े नेता (जिसके पास 5 विधायकों की बड़ी ताकत है और जिसे इतिहास की किताबों के सैयद बंधुओं की तरह किंग मेकर कहा जाता है) ने कह दिया कि राष्ट्रीय पार्टी को धैर्य से काम लेना चाहिए।
राष्ट्रीय पार्टी ने धैर्य क्यों खोया ये सबको पता है... अपमान का बदला लेने के लिए इससे बेहतर और विकल्प नहीं हो सकता था समर्थन ही वापस ले लें। लेकिन इसकी केवल घोषणा की गई.... समर्थन वापस नहीं लिया गया। दरअसल अंदर की ख़बर ये है कि सेल वाले इस राज्य को लुटने के लिए राज्य के कई नेताओं ने ठेकेदारों और माफ़ियाओं से करोड़ों रुपये ले रखे हैं .. इसलिए सरकार का बने रहना जरूरी है। यही वज़ह है कि राष्ट्रीय पार्टी ने राजभवन तक समर्थन वापसी का नहीं बल्कि माफीनामे का पत्र भेजा।... और अब चल रहा है मीटिंगों का सिलसिला.... ताकि पब्लिक की नज़र में भी इज़्ज़त बनी रहे और जरूरी फ़ाइलें भी निबटा ली जाएं।

हां एक और जरूरी बात.... सिद्धांतों के नाम पर राजनीति करने वाली पार्टी ने आख़िर अपने सहयोगी मुख्यमंत्री को समझाया क्यों नहीं कि आप पिछले चार महीने से सीएम की कुर्सी पर बैठे हैं.... आपको संसद में आकर वोटिंग नहीं करनी चाहिए..... ये नैतिकता के विरूद्ध है।....... और,
मेरा सवाल क्या जिन मुद्दों की व्याख्या संविधान में नहीं की गई है उनपर हमारे नेताओं को जो जी में आए वो करने का अधिकार है?



सूचना- ये कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है और इसका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति; समुदाय या प्रांत से कोई संबंध नहीं ... और अगर है तो ये महज़ एक संयोग है।

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