बुधवार, 7 अप्रैल 2010

इसका नाम पूजी है

कल की शाम में कुछ खास थी । लेकिन ये शाम की खासियत नहीं.... उसकी वजह आज है....यानी मेरे सप्ताहांत की छूट्टी दिन। इसलिए कल जल्दी ही सो गया...वीक ऑफ का पूरा आनंद उठाने के लिए। शहरों में लोग मॉर्निंग वॉक को जाते हैं। इसकी कितनी जरूरत है मुझे नहीं पता। खैर मैं भी सुबह निकल पड़ा.....। हवा में शीतलता कम थी। ये आने वाली गर्मी का एहसास करा रही थी। अपनी सोसायटी के सेंट्रल पार्क में टहल रहा था। वैसे मेरे लिए सुबह की सैर का ये पहला अनुभव नहीं था...(लेकिन लंबे वक्त या यूं कहें कि कई साल बाद सुबह की सैर करने निकला था) और जो चीज मैं देख रहा था... वो भी कई बार देख चुका हूं। लेकिन इस बार आंखें बहुत कुछ और भी देख रही थीं या अनुभव कर रही थीं। पहला अनुभव ये कि पार्क में टहलने वालों में ज्यादातर महिलाएं थीं। इसकी वजह शायद यही हो सकती है पुरूष या दो दफ्तर के लिए तैयार हो रहे होंगें या कल की थकावट ने उन्हें जगने नहीं दिया होगा। वैसे भी लोग शहरों में ज्यादा देर तक सोते हैं और दफ्तर जाते हुए सड़कों पर आपाधापी पी पी पूं पूं पें पें.... मचाते हैं। खैर पार्क की महिलाओं में जितनी महिलाओं के साथ छोटे बच्चे थे... ज्यादातर एक टोकरी में पड़े थे (जिसमें पहिए लगे थे).... सब्ज़ी की तरह और जितनी महिलाओं के साथ कुत्ते थे ज्यादातर गोद में थे (कुछ के माथे पर टिकुली और बिंदी भी दिख रही थी)... नन्हें बच्चों की तरह। अक्सर ये आरोप लगाया जाता है कि भारत में लोग बच्चों से प्यार नहीं करते उनपर दया करते हैं और उन्हें अपनी कमज़ोरी बना लेते हैं। लेकिन पार्क का नज़ारा देखकर लगा कि ये आरोप लगने जल्द ही खत्म हो जाएंगे।
मैं सोचने लगा जिन महिलाओं के बच्चे स्कूल जाने लायक होंगे उन्हें नौकर- चाकर तैयार कर रहे होंगे या कुछ मामलों में बच्चों के पिता (हालांकि महानगरों की जीवलशैली में इसकी संभावना कम है)। यानी ज्यादातर बच्चों की मां अपना फ़िगर मेंटेन करने में व्यस्त हैं और बच्चे नौकरों के हाथों पल रहे हैं।
पार्क में एक बोर्ड लगा है जिसपर लिखा है कृपया पार्क को साफ सुथरा रखने में हमारी मदद करें और कुत्तों को मल-मूत्र के लिए बाहर ले जायें। वहीं एक कोने पर मदर डेरी का बूथ है जहां पर सुबह के नास्ते के लिए दूध... जैम... जेली... और ब्रेड... जैसी चीजों की खरीददारी चल रही है। पार्क के पास ही एक मंदिर है कुछ बुजुर्ग लोग अपनी धीमी चाल में उस तरफ भी हलचल करते हुए दिखाई दे रहे हैं।
सुबह की किरणें धीरे-धीरे तेज़ हो रही थीं.. मुझे भी चाय की तलब हुई सो वापस आने लगा। लेकिन सैर के बाद मन हल्का होने की जगह भारी हो रहा था। माहौल में अजीब- सा वीरानापन, खोखलापन दिख रहा था.... जैसे ही अपने फ्लैट के दरवाज़े पर पहुंचा, पूरा चेहरा गुस्से से लाल हो गया। सुबह-सुबह जिस कुत्ते की परवरिश देखकर शून्य में भविष्य को तलाश रहा था उसी ने वर्तमान की सतह पर पहुंचा दिया। एक कुत्ते ने दरवाज़े के सामने ही अपने सुबह का क्रिया- कर्म कर दिया था। मैंने पड़ोस के फ्लैट में आवाज़ लगाई और कहा, आंटी आपके कुत्ते ने बाहर गंदा कर दिया है...., आंटी... आंटा के रूप में (पहनावे के आधार कह रहा हूं).. बाहर निकलीं ..साथ में कुत्ता भी दुम हिलाते हुए मेरी तरफ बढ़ा ... और आंटा जैसी आवाज़ में आंटी ने कहा इसका नाम पूजी है। मैं चौंक गया...पहले तो कुत्ते का नाम लिंग-भेद के आधार पर जानकर और फिर पूजा जैसे पवित्र नाम को कुत्ते के खाते में डालने से। मैं जवाब दे पाने की स्थिति में नहीं था। वीक ऑफ़ और मूड ऑफ दोनों एक साथ होने की वजह से दो-चार अखबार और पत्रिकाएं लेने बाहर निकल पड़ा। वापस आया तो गंदगी साफ हो चुकी थी... शायद आंटी ने खुद ही साफ किया था क्योंकि नौकर-चाकर दूसरे फ्लैट में काम करने जा चुके थे। सुबह से ही कानों में एक आवाज़ गूंज रही है... इसका नाम पूजी है...। अखबारों में दिल नहीं लगा तो सोचा आपलोगों से पूछूं.... ये कहां जा रहे हैं हम? चंदन जजवाड़े

सनसनी

दफ़्तर में मेरे एक सीनियर ने मुझसे पूछा... चन्दन मैनें तो कभी सनसनी नहीं देखी, क्या तुमने देखी है? मैंने उनसे इस तरह के सवाल की अपेक्षा नहीं की थी...मन में आया कि ये क्या सवाल है... लेकिन सोचने लगा सुबह से शाम तक ना जाने कितनी बार इस शब्द सुनता हूं लेकिन कभी मुलाक़ात नहीं हो पायी। बचपन से आज तक ऐसे माहौल में रहा कि कभी सनसनी देख नहीं पाया। कुछ साल पहले तक, जब देवघर में रहता था तो एकाध बार माहौल बना था..... सनसनी से मुलाकात का। दो गुटों या गैंग में लड़ाइयां हर जगह होती है... वहां भी हुआ करती थीं। किसी गुट के गुर्गे की हत्या के बाद शहर में सनसनी फैलने का ख़तरा बन जाता था...... एक गुट का गुर्गा मरता था तो दूसरे गुट के गुर्गे पुलिस के डर से भागे फिरते थे। फिर क्या शहर कुछ दिनों के लिए शांत हो जाता था। सो हत्या के बाद सनसनी नहीं, शहर में अमन का माहौल होता था... इसलिए कभी सनसनी से मुलाकात नहीं हुई।
अपराध के बाद किसी इलाके में सनसनी फैले न फैले टीवी के स्क्रिन पर जरूर फैल जाती है। शतरंज के खिलाड़ी कहानी का अंतिम भाग याद आता है.. कथाकार प्रेमचंद लिखते हैं (मीर और मिरजा दोनों बादशाहों की मृत्यु के बाद) “ चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ था। खंडहर की टूटी हुई मेहराबें, गिरी हुई दीवारें और धूल-धूसरित मीनारें इन लाशों को देखती और अपना सिर धुनती थीं ।“ भई दीवार और मीनार को सिर धुनते हुए मैं क्या .. कोई भी नहीं देख सकता। लेकिन कल्पना करता हूं तो एक चित्र सामने होता है। लेकिन ये सनसनी क्या बला है... बाइक पर स्टंट से सनसनी, हत्या के बाद सनसनी, लूट के बाद सनसनी, झगड़े के बाद सनसनी.... यानी हर बात पर सनसनी। आखिर क्या है ये सनसनी...... कोई बताएगा क्या?