कवियों को प्रकृति से अजीब सा लगाव होता है। गद्य कविता (छंदमुक्त) के एक बड़े कवि से अपनी छोटी-सी जान पहचान है। अक्सर बनारस से देवघर आते हैं। एक बार देवघर यात्रा के दौरान मुझसे कहा...बेटा चलो त्रिकुट पहाड़ चलते हैं सैर करने। ये पहाड़ी देवघर से कोई 6-7 किलोमीटर दूर है।
शाम का वक्त था हम बस से वहां तक पहुंचे और पहाड़ी पर चढ़ने लगे। चढ़ते हुए हम दोनों बूरी तरह थक चुके थे। लगभग हमारे समानांतर ही 10- 12 साल की एक बच्ची भी पहाड़ों की चढ़ाई कर रही थी.... उसकी गोद में एक बच्चा भी था। आस- पास के ही किसी गांव की लग रही थी। हमें हांपता देख वो हंसे जा रही थी..... मेरी जवान हड्डियों पर और ज्ञान जी के प्रकृति प्रेम पर। मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने पूछ लिया.... हंस क्यों रही हो... गोद में कौन है...भारी नहीं लग रहा है? बच्ची ने जवाब में केवल इतना कहा मेरा भाई है? अब ज्ञान जी से रहा नहीं गया तो बोल पड़े भाई है तो क्या हुआ.... भारी नहीं लग रहा ? बच्ची ने जवाब दिया.... भाई है तो भारी कैसे लगेगा? इस जवाब के बाद न तो मेरे पास सवाल बचा न ही ज्ञान जी के पास। दस साल की एक बच्ची ने ज्ञान जी को भी ज्ञान दे दिया और मुझे भी....... भाई है तो भारी कैसे लगेगा?
शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010
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