शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

विरासत

अंधे भक्तों की आंखों में धूल झोंककर ये हलवे बहुत दिनों तक खाने को नहीं मिलेंगे महाराज, समय तेज़ी से बदल रहा है.. अब भगवान भी दूध से नहीं पानी से नहाते हैं। मेरा निवेदन है कि पत्रकारिता के मेरे सीनियर ज़रा इन पंक्तियों पर गौर करें... आख़िर कितने दिनों तक हम दर्शकों को बेवकूफ बनाते रहेंगे।

उपर की लाइने कथाकार प्रेमचंद ने कर्मभूमि में कही हैं.... ये मुझे अचानक ही याद नहीं आ गईं। दिनभर की थकान के बाद घर आकर खाना- खाने बैठा तो उम्मीद थी कि कोबाल्ट-60, झारखंड मामला, CRPF हथियार केस और, सार्क जैसे गंभीर विषयों पर कोई अच्छी ख़बर देखने को मिलेगी। लेकिन नहीं, दुर्भाग्य से ऐसा चैनल लग गया जिसपर महेन्द्र सिंह धोनी दिख रहे थे। यहां तक गनीमत थी लेकिन मेरी समझ में ये नहीं आता कि ये माही क्या है? क्यों युवी, भज्जी, कैट, बेबो, किंग खान, बिग बी, ऐश, कंगारूओं और कीवि जैसे सैंकड़ों शब्दों का हज़ारों बार इस्तेमाल करते हैं। क्या इनकी पहचान इसी नाम से है। जरा सोचिए हमारे ही पेशे में किसी को सही नाम के बज़ाय दीपू, पप्पू, रवि, मनो, विनो, राजू, आशु जैसे नामों से पुकारा जाय तो कैसा रहेगा?


शब्दों के मामले में ही एक और समस्या अरबी और फारसी के गैर ज़रूरी इस्तेमाल पर है। क्या हमारे पास खुलासा, कवायद, दहशतगर्द, मौका, ऐलान तफ़्तीश, वारदात, नापाक, मंसूबा जैसे शब्दों का विकल्प नहीं है। अक्सर दलील दी जाती है कि टीवी में बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल होता है....लेकिन बोलचाल में इन शब्दों का इस्तेमाल हमने तो कहीं नहीं देखा। तो क्या ये माना जाय कि उर्दू और हिन्दी को मिलाकर हम गंगा- यमुनी तहज़ीब को एक नया आयाम देना चाहते हैं। क्या दर्शकों को हम परोक्ष रूप से ये एहसास कराना चाहते हैं कि टीवी मीडिया भाषा को एक कर धर्मों को एक करना चाहती है। अगर हां, तो ये कभी नहीं हो सकता। इस कोशिश में बादशाह अकबर का दीन-ए-इलाही तक असफल रहा था...जबकि हिन्दुस्तान को अकबर की ताकत का अहसास था। और अगर इन शब्दों का इस्तेमाल केवल एंकर या न्यूज़ रीडर के लिए भाषा को सरल बनाना है तो भी ये एक खोखली दलील से ज्यादा कुछ नहीं है।


मेरी एक और शिकायत एंकरों और रिपोर्टरों के सवाल छोड़ने पर है। हर मुद्दे पर सवाल छोड़ दो...चाहे आपको विषय की जानकारी हो या ना हो। सालभर या छह महीने का कोर्स कर लिया बन गये पत्रकार और फिर दुनिया कदमों के नीचे। चाहे सामने वाले ने ऑफिसर बनने के लिए जितनी किताबें पढ़ीं हो उतने पन्ने मेरे मित्र रिपोर्टर ने अपनी ज़िंदगी में नहीं पढ़े हों..... लेकिन ये सवाल छोड़ने से पीछे नहीं हटेंगे। कोबाल्ट- 60 क्या है.... न्यूक्लियर रिएक्शन क्या होता है.....अलफा-बीटा-गामा रेज़ क्या है.. रेडिएशन क्या होता है...मैजिक नंबर क्या है... रेडियोएक्टिव डिके क्या होता है....बॉन मेरो ट्रांसप्लान्टेशन क्या होता है..WBC, RBC क्या है... इनके बनने और नष्ट होने में बॉन-मेरो की क्या भूमिका है..... कुछ नहीं पता हो फिर भी माइक लेकर एक सवाल छोड़ दो। जवाब देने की गंदी आदत तो हमने डाली ही नहीं।

व्यक्तिगत तौर पर मेरी किसी से रंज़िश नहीं है और ना ही मैं जॉब फ्रस्ट्रेशन का शिकार हूं.... लेकिन लोग हमारी इन आदतों पर सवाल उठाते हैं। इसलिए मेरी विनती है कि मेरे सीनियर्स कृपया इन मुद्दों पर विचार करें। हमने अपनी मेहनत से थोड़ी समझ और थोड़ी जानकारी हासिल कर ली है....विरासत में हमें क्या मिलता है ये आप लोगों पर निर्भर है?

1 टिप्पणी:

  1. लिखा तो बेहतरीन है दोस्त.. लेकिन टीवी में तो वही भाषा इस्तेमाल होगी न जो समझ में आएगी.. आप तो खुद टीवी में हो बखूबी जानते हो.. अगर किंकर्तव्यविमूढ़ शब्द टीवी में चलाया जाए,तो आपको क्या लगता है, लोग टीवी बंद नहीं कर देंगे.. हां टीवी में अधकचरा ज्ञान पनप रहा है इससे मैं भी सहमत हूं..

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