मंगलवार, 11 मई 2010

हंगामा है क्यों बरपा

वन और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश एक बार फिर चर्चा और विवादों के केन्द्र में हैं। वो शायद पहले ऐसे पर्यावरण मंत्री हैं जो चर्चा में बने रहते हैं....और इसलिए आम लोग भी इस पर्यावरण मंत्री को जानने लगे हैं। पहले इस मंत्रालय का जिम्मा किस किसके पास रहा कम ही लोगों को पता होगा। जयराम रमेश के चर्चित रहने के पीछे एक बड़ी वजह ये भी हो सकती है कि इस दौरान कोपेनहेगेन सम्मेलन हुआ जिसपर पूरी दुनिया की नज़र थी। लेकिन कोपेनहेगेन के पहले और बाद में भी वो दूसरी कई वजहों से विवादों में रहे.... कभी पॉलिथिन बैग के इस्तेमाल के मुद्दे पर तो कभी भारत को गंदगी का नोबेल देने के नाम पर... और अब चीन की वकालत करने के नाम पर।
दरअसल इन मुद्दों पर हमने आनन फानन में अपने विचार बना लिए और ख़बरों की तलाश में ख़बरों ना पहचान पाने की गलती करते रहे। अगर जयराम रमेश ने प्लास्टिक बैग के इस्तेमाल को जारी रखने की वकालत की, तो हमने इसे पर्यावरण से जोड़ दिया। जरा सोचिए आख़िर हम किन किन चीज़ों को ढ़ोने के लिए जूट के थैले का इस्तेमाल कर सकते हैं। काग़ज की जरूरतों को पूरा करने के लिए कितने पेड़ों की बली चढ़ा सकते हैं। प्लास्टिक के इस्तेमाल के बाद कूड़े के प्रबंधन की जिम्मेवारी लोकल बॉडिज़ (जैसे एमसीडी और एनडीएमसी) की होती है। अगर वो नाकाम हैं तो विवादों में जयराम क्यों? वैसे भी प्लास्टिक पर पाबंदी कितना सफल है हम सब देख रहे हैं।


दूसरा विवाद भारत को गंदगी का नोबेल दिलाने से जुड़ा है। हमारे देश में कूड़े- कचरे और गंदगी की हालत से कौन वाकिफ नहीं है? गंदगी ने मानव सभ्यता से भी पुरानी कई नदियों का अस्तित्त्व खत्म कर दिया है और यहां भी मामला स्थानीय निकायों की नाकामी और हमारी आदतों से जुड़ा है लेकिन विवादों में जयराम रमेश रहे। गंगाजी में स्नान को लेकर जयराम के बयान पर भी खूब हंगामा हुआ। यहां मामला धार्मिक है और इसलिए थोड़ा संवेदनशील भी। लेकिन जिस नदी को हमने भगवान की तरह पूजा है उसकी क्या हालत हो गई ये किसी से छिपा नहीं है। लोग अपना पाप धोने के लिए आते हैं और, नदी में अपना पाप फैलाकर चले जाते हैं। हमने कुंभ मेले के दौरान हरिद्वार में ऐसा एक नहीं बल्कि सैंकड़ों बार देखा। साधू- संत धर्म ध्वज की रक्षा का दावा करते हैं... शाही स्नान कुंभ के दौरान करते हैं लेकिन शाही जीवन सालोंभर जीते हैं। कई आश्रमों से निकलने वाली शाही जीवन की गंदगी सीधे गंगा में गिरती है। जब धर्म का आडंबर करने वालों को इसका खयाल नहीं रहा तो जयराम को संबंधित मंत्री होने के नाते याद आया... जयराम तेरी गंगा मैली। लेकिन हमने यहां भी सच्चाई की नहीं विवादों की रिपोर्टिंग की।
हाल ही में कई मंत्रालयों के काम को हरी झंडी ना देने की वजह से भी मंत्रीजी चर्चा में रहे... ख़ासकर कई सड़क परियोजनाओं को रोकने के कारण। हमने इस मुद्दे को भी खूब हवा दी.... सरकार के मंत्रियों में ठनी, मैं रबर स्टांप नहीं हू- जयराम रमेश, सरकार का अपने की मत्रियों पर नियंत्रण नहीं.....इत्यादी। हम भूल गये कि विकास की अंधी दौड़ और अदूरदर्शी योजनाओं ने पर्यावरण का क्या हाल कर दिया है। अगर कोई मंत्री इसके लिए आगे बढ़ा है तो हमें उसका साथ देने चाहिए था। लेकिन हमने ऐसा नहीं किया क्योंकि सरकार के मंत्रियों की आपसी लड़ाई हमारे लिए चटपटी ख़बर है। पेड़ों को काटकर पत्थर के जंगल बनवाने के मुद्दे पर हमने मायावती के खिलाफ रिपोर्टिंग की, लेकिन यहां......मंत्रियों के बीच की खींचतान पर।
अब बात करते हैं सबसे ताज़ा मामले की। जयराम रमेश ने चीन में जो बयान दिये, निश्चित तौर पर इसकी अपेक्षा नहीं की जा सकती। विदेशी कंपनियों की वकालत करना और अपने मंत्रियों के फैसलों पर सवाल खड़ा करना जायज़ तो बिल्कूल नहीं दिखता। बीजेपी ने परंपरागत तरीके से इसका विरोध किया और, कांग्रेस ने परंपरागत तरीके से असहमति जताई जयराम रमेश से भी और बीजेपी से भी । लेकिन हममें से किसी ने नहीं सोचा कि जयराम को अगर किसी की वकालत करनी होती तो मीडिया के सामने नहीं बल्कि व्यक्तिगत तौर पर संबंधित मंत्री से बात की जा सकती थी। मीडिया के सामने बयान देकर 7 RCR और 10 JANPATH की नाराज़गी मोल लेने के पीछे आखिर जयराम का मक़सद क्या हो सकता है?
अब इस मुद्दे पर एक बार फिर से विचार करते हैं... जयराम के चीन में दिये बयान को अगर मीडिया ने तूल नहीं दिया होता तो क्या होता? चीनी कंपनियां और चीन सरकार जयराम के इस सार्वजनिक बयान से खुश जरूर होंगी और कहीं न कहीं जयराम के हर चीनी दौरे पर उनको इसका लाभ मिलता... भले ही जयराम के बयान से कंपनियों को भारत में लाभ मिले ना मिले। इसका सीधा असर भारत और चीन के रिश्ते पर पड़ता और बेसिक नेशंस की हरेक बैठक के साथ ही मेक्सिको में जलवायु परिवर्तन को लेकर होने वाले अगले सम्मेलन में चीन और भारत के बीच दोस्ती थोड़ी और गाढ़ी दिखती। इधर जयराम रमेश अपने सेनापति और बाकि सहयोगियों से केवल इतना कह देते कि ये डिप्लोमेसी के अलावे कुछ भी नहीं। लेकिन हमने ऐसा नहीं होने दिया और भारत में पनप रही चीन विरोधी मानसिकता का संदेश दे दिया।
मैं किसी की वकालत नहीं कर रहा। पर क्या ये सच नहीं है कि लंबे समय के बाद कोई ऐसा मंत्री मिला है जो बाघों को बचाने के लिए गंभीर है, जो नदियों के बारे में सोचता है, जिसने डाल्फिन को एक ख़ास जगह दी है, जो पर्यावरण की चिंता करता है, जो कई तरह की योजनाओं पर एक साथ काम कर रहा है.....और सबसे बड़ी बात कि जिसे अपने भ्रष्ट और कामचोर अधिकारियों पर भरोसा नहीं है। अगर ये सच है, तो फिर ये हंगामा क्यों?

रविवार, 2 मई 2010

जादुई ज़मीन का अंधेरा

एक कहानी सुनाता हूं... इसकी सौ फ़ीसदी गारंटी है कि सुनकर मज़ा आएगा। एक गांव में कुआं खुदवाया गया... पूरे 5 लाख रुपये के सरकारी खर्च पर... बीस फूटिया कुआं( इस इलाके में 20 फूट चौड़े मूंह वाले कुएं को इसी नाम से जानते हैं)... । मकसद था.. इलाके के खेतों की सिंचाई.. क्योंकि यहां न तो नदी है, न नहर। कुछ दिनों बाद कुआं खुदवाने वाले अधिकारी का जनहित में कहीं और तबादला हो गया। क्योंकि सरकार मानती है कि एक अधिकारी के एक ही जगह लंबे समय तक बने रहने से वहां उसका स्वार्थ पैदा हो जाता है और कामकाज़ में भेदभाव होने लगता है। उनकी जगह आए नये अधिकारी ने इलाके के विकास कार्यों का जायज़ा लिया। नये अधिकारी महोदय ने पाया की जिस कुएं के नाम पर कुछ ही दिन पहले 5 लाख रुपये खर्च किये गए, वो असल में कहीं है ही नहीं। फिर उन्होंने पुराने अधिकारी से संपर्क किया। उसके बाद क्या हुआ ज़रा गौर करें.... फिर से एक फाइल बनी जिसमें दलील दी गई की कुआं सड़क के किनारे ऐसी जगह बना दी गई है जिससे मवेशी अक्सर इसमें डूब जाते हैं और, जिस मकसद से कुआं खुदवाया गया था वो भी पूरा नहीं हो पा रहा है क्योंकि यह खेतों से काफी दूर है। इसलिए इस कुएं को भर दिया जाय।....... फिर 20 हज़ार रुपये के सरकारी खर्च पर कुएं में मिट्टी डालकर इसे बंद कर दिया गया।
ये है सूचना के अधिकार की हकीकत.....। आखिर लोग सूचना के अधिकार के अधीन कौन-सी सूचना मांगेंगे... जबकि सिस्टम में पारदर्शिता ही नहीं है। सरकार क्या करा रही है.... किन योजनाओं पर पैसे खर्च हो रहे हैं, एक आम इंसान को कौन बताए? वैसे मैं भी एक आम इंसान ही हूं... ये महज़ संयोग है कि मुझे इस अनोखी घटना की जानकारी मिल गई क्योंकि इनमें से एक अधिकारी मेरे किसी रिश्तेदार के किरायेदार थे...... वरना ऐसे कितने सरकारी कुएं अब तक बिना खुदाई के ढके गये होंगे किसी को नहीं मालूम। (मेरे आम इंसान होने का एक और प्रमाण ये है कि इस घपले की जानकारी मिलने के बाद भी मैं चुप रहा, क्योंकि मैं किसी पचड़े में नहीं पड़ना चाहता था।)
उम्मीद है कहानी सुनकर आपको मज़ा आया होगा और यही इस राज्य का दुर्भाग्य भी है कि लोग इसकी कहानियों में मज़े लेने लगे हैं।। बारह महीने 13 त्योहार ........ 10 साल आठ सरकार। बड़े अरमानों और लंबी लड़ाई के बाद ये राज्य बना था... खनिज संपदा से भरपूर। कल्पना की गई कि ये देश का सबसे विकसित राज्य होगा। लेकिन हुआ ठीक विपरीत। नये राज्य के नाम पर भूगोल के मानचित्र पर एक रेखा खींची गई.... एक राजधानी बना दी गई... कुछ नये अधिकारियों की नियुक्ति हो गई। तमाम संसाधनों से भरपूर होने के बाद भी ये राज्य कभी एक अच्छा प्रोडक्ट नहीं दे पाया..... हालांकि यहां सेल सालोंभर लगा रहता है..... लूटो....लूटो ......लूटो....।

सुनने में आया है कि यहां कि सरकार एक बार फिर से खतरे में है। आरोप हमेशा यहां की छोटी पार्टियों और निर्दलियों पर लगा है कि वो राज्य का हित नहीं केवल अपना हित चाहते हैं... इसलिए कुछ जेल तो कुछ बेल पर रहते हैं। लेकिन इस बार एक छोटी पार्टी के बड़े नेता (जिसके पास 5 विधायकों की बड़ी ताकत है और जिसे इतिहास की किताबों के सैयद बंधुओं की तरह किंग मेकर कहा जाता है) ने कह दिया कि राष्ट्रीय पार्टी को धैर्य से काम लेना चाहिए।
राष्ट्रीय पार्टी ने धैर्य क्यों खोया ये सबको पता है... अपमान का बदला लेने के लिए इससे बेहतर और विकल्प नहीं हो सकता था समर्थन ही वापस ले लें। लेकिन इसकी केवल घोषणा की गई.... समर्थन वापस नहीं लिया गया। दरअसल अंदर की ख़बर ये है कि सेल वाले इस राज्य को लुटने के लिए राज्य के कई नेताओं ने ठेकेदारों और माफ़ियाओं से करोड़ों रुपये ले रखे हैं .. इसलिए सरकार का बने रहना जरूरी है। यही वज़ह है कि राष्ट्रीय पार्टी ने राजभवन तक समर्थन वापसी का नहीं बल्कि माफीनामे का पत्र भेजा।... और अब चल रहा है मीटिंगों का सिलसिला.... ताकि पब्लिक की नज़र में भी इज़्ज़त बनी रहे और जरूरी फ़ाइलें भी निबटा ली जाएं।

हां एक और जरूरी बात.... सिद्धांतों के नाम पर राजनीति करने वाली पार्टी ने आख़िर अपने सहयोगी मुख्यमंत्री को समझाया क्यों नहीं कि आप पिछले चार महीने से सीएम की कुर्सी पर बैठे हैं.... आपको संसद में आकर वोटिंग नहीं करनी चाहिए..... ये नैतिकता के विरूद्ध है।....... और,
मेरा सवाल क्या जिन मुद्दों की व्याख्या संविधान में नहीं की गई है उनपर हमारे नेताओं को जो जी में आए वो करने का अधिकार है?



सूचना- ये कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है और इसका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति; समुदाय या प्रांत से कोई संबंध नहीं ... और अगर है तो ये महज़ एक संयोग है।