बुधवार, 7 अप्रैल 2010

सनसनी

दफ़्तर में मेरे एक सीनियर ने मुझसे पूछा... चन्दन मैनें तो कभी सनसनी नहीं देखी, क्या तुमने देखी है? मैंने उनसे इस तरह के सवाल की अपेक्षा नहीं की थी...मन में आया कि ये क्या सवाल है... लेकिन सोचने लगा सुबह से शाम तक ना जाने कितनी बार इस शब्द सुनता हूं लेकिन कभी मुलाक़ात नहीं हो पायी। बचपन से आज तक ऐसे माहौल में रहा कि कभी सनसनी देख नहीं पाया। कुछ साल पहले तक, जब देवघर में रहता था तो एकाध बार माहौल बना था..... सनसनी से मुलाकात का। दो गुटों या गैंग में लड़ाइयां हर जगह होती है... वहां भी हुआ करती थीं। किसी गुट के गुर्गे की हत्या के बाद शहर में सनसनी फैलने का ख़तरा बन जाता था...... एक गुट का गुर्गा मरता था तो दूसरे गुट के गुर्गे पुलिस के डर से भागे फिरते थे। फिर क्या शहर कुछ दिनों के लिए शांत हो जाता था। सो हत्या के बाद सनसनी नहीं, शहर में अमन का माहौल होता था... इसलिए कभी सनसनी से मुलाकात नहीं हुई।
अपराध के बाद किसी इलाके में सनसनी फैले न फैले टीवी के स्क्रिन पर जरूर फैल जाती है। शतरंज के खिलाड़ी कहानी का अंतिम भाग याद आता है.. कथाकार प्रेमचंद लिखते हैं (मीर और मिरजा दोनों बादशाहों की मृत्यु के बाद) “ चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ था। खंडहर की टूटी हुई मेहराबें, गिरी हुई दीवारें और धूल-धूसरित मीनारें इन लाशों को देखती और अपना सिर धुनती थीं ।“ भई दीवार और मीनार को सिर धुनते हुए मैं क्या .. कोई भी नहीं देख सकता। लेकिन कल्पना करता हूं तो एक चित्र सामने होता है। लेकिन ये सनसनी क्या बला है... बाइक पर स्टंट से सनसनी, हत्या के बाद सनसनी, लूट के बाद सनसनी, झगड़े के बाद सनसनी.... यानी हर बात पर सनसनी। आखिर क्या है ये सनसनी...... कोई बताएगा क्या?

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