चाहे बीजेपी महंगाई का विरोध करे चाहे वामदल हल्लाबोले .. हकीकत यही है कि आमलोगों का समर्थन इस मुद्दे पर किसी पार्टी को नहीं मिल रहा और अलग अलग चुनावो के परिणाम इसकी गवाही देते हैं। दिल्ली में महंगाई के खिलाफ बीजेपी ने पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के जितने विरोध प्रदर्शन किये उतनी रोटियां एक सामान्य इंसान दिनभर में नहीं खा पाता है। लेकिन इसका अंजाम हर किसी के सामने है। बंगाल में भी हालात कुछ ऐसे ही रहे। वहां जनमुद्दों को जनता तक पहुंचाने के लिए नेताओं को सड़कों पर नहीं उतरना पड़ता है। क्योंकि मछलियों की ज़िदगी पानी में ही कटती है और उसे पानी का स्वाद पता होता है।
दरअसल जिनके पास रोटी नहीं है वो एक रुपये की रोटी भी नहीं खरीद सकते और 5 रुपये की भी नहीं। जिनके पास रोटी है वो जानते हैं कि सड़कों पर उतरने से उनका एक पूरा दिन ही खराब होगा और हासिल के नाम पर कुछ भी नहीं। लोगों को पता है अगर सरकार वेतन आयोगों की सिफारिशों को लागू कर रही है, अगर न्यूनतम समर्थल मूल्य और मज़दूरी बढ़ा रही है तो महंगाई बढ़नी ही है। फिर भी जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं उनके पास कोई ठोस योजना या कोई तरीका हो तो सड़कों के बजाय संसद में अपनी सलाह दें। और, मान लिया जाय कि रोटी की कीमत अगर 5 रूपये से एक रूपये पर आ भी जाती है तो भी अर्थशास्त्र का सामान्य नियम यही कहता है कि बाज़ार में पैसे ज्यादा होगें तो इसकी कीमत घटेगी यानि महंगाई बढ़ेगी। इसलिए आम जनता ने आमतौर पर महंगाई के भूत से डरना छोड़ दिया है। मिसाल के तौर पर आप खुद को या अपने किसी मित्र को ही लें.... वो रोटी के लिए नहीं बल्कि थाली ... डायनिंग सेट.... डायनिंग टेबल.....घर और कार के लिए परेशान है, सौ नहीं हज़ार के लिए परेशान है।
इसलिए मेरे रामभक्त साथियों और सुदामा भक्त सज्जनों अगर सच में तुम्हें उन 25 करोड़ लोगों की चिंता है जिसके पास रोटी नहीं तो इसके लिए दिल्ली और दिल्ली के लोगों को क्यों परेशान कर रहे हो? ये रिमोट मदरिंग छोड़ों और उनके पास जाओ। प्यासा कुएं तक आता है लेकिन लाचार रोगियों तक दवाइयां ले जानी होती हैं। क्यों हज़ारों- लाखों कार्यकर्त्ताओं के सामने गश खाकर गिर रहे हो? अगर आप डूबते को बचाना चाहते हैं तो खुद तैरना सीखिए....कमज़ोरों की मदद करने के लिए ताकतवर बनना होगा। अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के चक्कर में क्यों अपनी कमज़ोरी दिखा रहे हैं?
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